डॉ मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी पर आधारित राजनीतिक फ़िल्मों पर जनता के बदलते विचार

January 14th, 2019 | POLITICS

डॉ मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी पर आधारित राजनीतिक फ़िल्मों पर जनता के बदलते विचार

भारत में राजनेताओं और राजनितिक मुद्दों पर फ़िल्में बनाना आम बात है यह आज से नहीं पिछले कई दशकों से होता रहा है लोग फिल्म देखते हैं उसका आनंद लेते हैं और फिर समय के साथ आगे बढ़ जाते हैं परन्तु पिछले कुछ समय से फिल्मों को लेकर विवाद होना आम बात हो गया है फिर चाहे वो फिल्म पद्मावत हो या दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर की. बात करें दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर की तो फिल्म के रिलीज़ होने के पहले काफी विवाद खड़ा हुआ था परन्तु जब फिल्म रिलीज़ हुई तो लोगों ने उसे खूब पसंद किया. कमाल की बात तो ये है की यह फिल्म एक पुस्तक पर निर्धारित है और उसी के हिसाब से बनायीं गयी है और यह पुस्तक जो संजय बरु ने लिखी थी वह 2014 में ही जनता के बीच पहुंच गयी थी. लोगों ने कभी पुस्तक को लेकर विवाद नहीं किया परन्तु जब फिल्म का ट्रेलर आया तो सबने आपत्ति जताई. मात्र ढाई मिनट के ट्रेलर को देख कर आपत्ति करने से पहले पांच साल पहले से बिक रही पुस्तक को खरीद कर पढ़ना किसी को उचित नहीं लगा. वहीँ अब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की जीवनी पर फिल्म आने वाली है. पिछली बार की तरह इस बार भी चर्चाएं तेज़ हैं. आपको बता दें फिल्मे मात्र मनोरंजन का साधन है इसके अलावा कुछ नहीं. 

एक उदहारण द्वारा कथन को स्पष्ट करना चाहूंगा - जब एम एस धोनी पर फिल्म बानी थी लोगों ने उसे खूब पसंद किया परन्तु जब महेंद्र सिंह धोनी का टीम में चयन होगा तो उनके पिछले प्रदर्शन को देख के होगा न की उनकी फिल्म देख के, हमे महेंद्र सिंह धोनी की फिल्म देख कर यह प्रेरणा मिली कैसे सामान्य घर का बालक अपनी मेहनत से भारतीय टीम को विश्व कप में विजय दिलाता है. यह फिल्म प्रचूर मात्रा में प्रेरणा का स्रोत है परन्तु महेंद्र सिंह धोनी को टीम में बने रहने के लिए निरंतर प्रदर्शन करना होगा. ठीक उसी तरह राजनेताओं बानी फिल्म उनके जीवन की छवि मात्र है चुनाव में उनको चुनने से पहले जनता उनके कार्यकाल में किये गए काम को देख के करेगी न की फिल्म देख के. 

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