यूपी के इस शख्स को मंत्री-पुलिस ही नहीं दाऊद भी करता था सलाम

May 14th, 2019 | POLITICS

यूपी के इस शख्स को मंत्री-पुलिस ही नहीं दाऊद भी करता था सलाम

लखनऊ : 90 के दशक में पूर्वान्चल यानी उत्तर प्रदेश के अखबारों के पन्नों पर दहशत का साया साफ दिखाई पड़ता था। हत्या, अपहरण, डकैती और अवैध उगाही में एक खास नाम की वजह से न केवल आम आदमी परेशान था, इस नाम ने प्रशासन के नाक में दम कर रखा था। इसी पर आधारित फिल्म 'रंगबाज' आज परदे पर माने नेटफ्लिक्स के परदे पर आपको दिखाई पड़ेगी।

भारत की गैंगस्टर हिस्ट्री में सबसे बड़ा नाम श्रीप्रकाश शुक्ला जिसने सिर्फ 25 साल की उम्र में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए श्रीप्रकाश की दहशत इतनी जबरदस्त थी कि पुलिसवाले उसका नाम सुनते ही बिजली की तरीके से कांपने लगते थे। श्रीप्रकाश शुक्ला फिल्मी स्टाइल में वह क्रिमिनल बना। बहन के साथ हुई छेड़छाड़ के बाद श्रीप्रकाश अपराधी बन गया। जिस लड़के ने श्रीप्रकाश की बहन को छेड़ा, उसका वहीं कत्ल कर दिया। यह श्रीप्रकाश का पहला मर्डर था।

पहला मर्डर करने के बाद श्रीप्रकाश सीधा बैंकॉक चला गया। जब वह भारत वापस आया तो पूरे जोश और उत्साह के साथ गैंगेस्टर बन गया। श्रीप्रकाश की गैंग में केवल 4 लोग ही थे। अकेले 20 हत्याएं खुद श्रीप्रकाश शुक्ला ने ही की थीं। आपको बता दें चाहें वो बिहार का मंत्री हो या विधायक, तमाम बड़ी शख्सियतों को मारने वाले श्रीप्रकाश ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने की सुपारी भी ली थी। यूपी, बिहार, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा गैंगेस्टर बनने में श्रीप्रकाश को ज्यादा समय नहीं लगा। 

ऐसे मारा गया श्रीप्रकाशः 23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को खबर मिलती है कि श्रीप्रकाश शुक्ला दिल्ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है। श्रीप्रकाश शुक्ला की कार जैसे ही वसुंधरा इन्क्लेव पार करती है, अरुण कुमार सहित एसटीएफ की टीम उसका पीछा शुरू कर देती है। उस वक्त श्रीप्रकाश शुक्ला को जरा भी शक नहीं हुआ था कि एसटीएफ उसका पीछा कर रही है। उसकी कार जैसे ही इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, मौका मिलते ही एसटीएफ की टीम ने अचानक श्रीप्रकाश की कार को ओवरटेक कर उसका रास्ता रोक दिया।

पुलिस ने पहले श्रीप्रकाश को सरेंडर करने को कहा लेकिन वो नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश शुक्ला मारा गया और इस तरह से यूपी के सबसे बड़े डॉन की कहानी खत्म हुई। माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला अपने पास हर वक्त एके47 राइफल रखता था।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक श्रीप्रकाश के खात्मे के लिए पुलिस ने जो अभियान चलाया, उस पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च हुए थे। यह अपने आप में इस तरह का पहला मामला था, जब पुलिस ने किसी अपराधी को पकड़ने के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च की थी, उस वक्त सर्विलांस का इस्तेमाल किया जाना भी काफी महंगा था। 

श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म 1973 में गोरखपुर के ममखोर गांव में हुआ था। उसके पिता एक स्कूल में टीचर थे। वह अपने गांव का मशहूर पहलवान हुआ करता था। साल 1993 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने उसकी बहन को देखकर सीटी बजाने वाले राकेश तिवारी नामक एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी।

गैंग में शामिल हुआः  हत्या के मामले में फरार श्रीप्रकाश शुक्ला बैंकॉक में खुले आम घूम रहा था। पैसे की तंगी के चलते वह ज्यादा दिन वहां नहीं रह सका। भारत वापस आने के बाद उसने मोकामा, बिहार का रुख किया और सूरजभान गैंग में शामिल हो गया। 

शाही की हत्या में आया नामः श्रीप्रकाश शुक्ला बाहुबली बनकर जुर्म की दुनिया में नाम कमा रहा था। इसी दौरान उसने 1997 में राजनेता और कुख्यात अपराधी वीरेन्द्र शाही की लखनऊ में हत्या कर दी। शाही के विरोधी हरि शंकर तिवारी के इशारे पर यह सब हुआ था। वह चिल्लुपार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता था। इसके बाद एक एक करके न जाने कितने ही हत्या, अपहरण, अवैध वसूली और धमकी के मामले श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम लिखे गए। 

रेलवे ठेकों पर था एक-छत्र राजः श्रीप्रकाश शुक्ला पुलिस की पहुंच से बाहर था। उसका नाम उससे भी बड़ा बनता जा रहा था। यूपी पुलिस हैरान-परेशान थी। नाम पता था लेकिन उसकी कोई तस्वीर पुलिस के पास नहीं थी। कारोबारियों से उगाही, किडनैपिंग, कत्ल, डकैती, पूरब से लेकर पश्चिम तक रेलवे के ठेके पर एकछत्र राज। बस यही उसका पेशा था। इसके बीच जो भी आया उसने उसे मारने में जरा भी देरी नहीं की। पुलिस तक उससे डरती थी।

एसटीएफ का गठनः लखनऊ सचिवालय में यूपी के मुख्यमंत्री, गृहमंत्री और डीजीपी की एक बैठक हुई। इसमें अपराधियों से निपटने के लिए स्पेशल फोर्स बनाने की योजना तैयार हुई। 4 मई 1998 को यूपी पुलिस के तत्कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को छांट कर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बनाई। इस फोर्स का पहला टास्क था श्रीप्रकाश शुक्ला को पकड़ना या जान से मारना।   

श्रीप्रकाश का क्राइम इतिहास-
11 जनवरी 1997, अमीनाबाद, लखनऊः 
लॉटरी के थोक व्यापारी पंकज श्रीवास्तव के घर में ही गोली मारकर हत्या।  
12 मई 1997, लखनऊः बिल्डर मूलचंद अरोड़ा की किडनैपिंग। श्रीप्रकाश ने ली एक करोड़ की फिरौती। 

अगस्त 1997, दिलीप होटल, लखनऊः होटल का कमरा नंबर 206. कमरे में चार लोग ठहाके लगा रहे थे। चाय नाश्ता कर रहे थे। होटल के नीचे दो लोग कार से उतरते हैं और उनके हाथ में एके47 थी। ये दोनों धड़धड़ाते हुए होटल की सीढियां चढ़ने लगते हैं। एक शख्स कमरे के दरवाजे पर लात मारता है और दरवाजा खुलते ही अंधाधुंध गोलियों की बौछार होने लगती है। इस बीच चार में से एक की गोली लगने से मौत हो जाती है। होटल में घुसकर गोरखपुर के 4 ठेकेदारों को गोली मारने की खबर कई दिनों तक सुर्खियां बनी रही।

अक्टूबर 1997, गोखले मार्ग, लखनऊः दवा व्यापारी के.के. रस्तोगी की गोली मारकर हत्या, उसके बेटे का अपहरण। एक करोड़ की फिरौती मांगी फिर छोड़ा।  

तारीख 18 जनवरी 1998, शिवनारायण पेट्रोल पंप, लखनऊः यूपी को ऑपरेटिव के चेयरमैन उपेंद्र विक्रम सिंह की ऑफिस के बाहर एके-47 से ताबड़तोड़ गोलियां मारकर हत्या। 

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